Thursday, December 16, 2010

कला का उद्देश्य

कला का उद्देश्य क्या है, किस लक्ष्य को वह सिद्ध करती है? कला का उद्देश्य है चित्रित करना, शब्दों, ध्वनियों, रेखाओं और रंगों में प्रकृति के सार्वभौम जीवन को पुनः मूर्त करना. यही कला की एकमात्र और चिरंतन विषय वस्तु है. कवि की प्रेरणा प्रकृति की रचनात्मक शक्तियों का प्रतिबिम्ब है. इसलिए कवि को, अन्य सबसे बढ़कर, प्रकृति का - भौतिक और आध्यात्मिक - दोनों रूपों में अध्ययन करना चाहिए. प्रकृति के प्रति उसके ह्रदय में प्रेम हो, संवेदनशीलता हो. अन्य सबसे बढ़कर, उसकी आत्मा शुद्ध और पवित्र हो. कारण कि उसके मंदिर में केवल नंगे पांव और स्वच्छ हाथों के साथ ही प्रवेश किया जा सकता है. केवल ऐसे ही लोग स्वर्ग के राज्य के वारिस होंगे; कारण यह कि मस्तिष्क और ह्रदय के सामंजस्य में ही मानव सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करता है. कवि जितना अधिक प्रतिभाशाली होगा, उतनी ही गहराई और व्यापकता के साथ वह प्रकृति को अपने ह्रदय से लगाएगा और उतनी ही सफलता से वह उसे उसके परम सजीव और घनिष्ठ रूप में कमरे लिए चित्रित करेगा.
                                                                                                                    -बेलिंस्की

Wednesday, December 15, 2010

कला और जीवन

कला को निश्चय ही पहले कला होना चाहिए, केवल इसके बाद ही वह किसी एक युग में समाज कि आत्मा और उसके रुझान कि अभिव्यक्ति हो सकती है. . .अगर उसमें कविता नहीं है तो न तो वह सुन्दर भावों को पेश कर सकती है , न किन्ही समस्याओं को. अधिक से अधिक उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि इसका आशय अच्छा था, लेकिन सारा गुड गोबर हो गया!
लेकिन, यह पूरी तरह मानते हुए भी कि कला को कला होना चाहिए, हम मानते हैं कि विशुद्ध हवाई कला का सिद्धांत, जो अपने ही लोक में रहता है और जीवन के अन्य पहलुओं से कोई वास्ता नहीं रखता, एक स्वप्निल शून्य है. ऐसी कला का कभी कही अस्तित्व नहीं रहा.(जोर हमारा)
                                                                                                            --बेलिंस्की

Sunday, December 12, 2010

अगर देश की सुरक्षा यही होती है
कि हर हड़ताल को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मरकर ही परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
बुद्धि हुक्म के कुँए पर रहट की तरह पानी ही भरेगी
मेहनत राजमहल की दर पर झाड़ू ही बनेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है
                                    (पाश)

Monday, December 6, 2010

In Lieu of an Editorial

आरंभ में वे क्रियाएं अत्यंत सरल रही हांगी, जिनके लिए हमारे पूर्वजों ने वानर से मानव में संक्रमण के हजारों वर्षों में अपने हाथों को अनुकूलित करना धीरे-धीरे सीखा होगा। निम्नतम प्राकृत मानव भी, वे प्राकृत मानव भी, जिनमें हम अधिक पशुतुल्य अवस्था में प्रतिगमन तथा उसके साथ ही साथ शारीरिक अपह्रास का घटित होना मान ले सकते हैं, इन अंतर्वर्ती जीवों से कहीं श्रेष्ठ है। मानव हाथों द्वारा पत्थर की पहली छुरी बनाए जाने से पहले शायद एक ऐसी अवधि गुजरी होगी, जिसकी तुलना में ज्ञात ऐतिहासिक अवधि नगण्य सी लगती है। किन्तु निर्णायक पग उठाया जा चुका था, हाथ मुक्त हो गया था और अब से अधिक दक्षता एवं कुशलता प्राप्त कर सकता था तथा इस प्रकार प्राप्त उच्चतर नमनीयता वंशागत होती थी और पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती जाती थी।
अतः हाथ केवल श्रमेन्द्रिय ही नहीं है, वह श्रम की उपज भी है। श्रम द्वारा ही, नित नयी क्रियाओं के प्रति अनुकूलन के द्वारा ही, इस प्रकार उपार्जित पेशियों, अस्थिबंधों - और अधिक दीर्घतर अवधियों में हड्डियों - के विशेष विकास की वंशागतता के द्वारा ही तथा इस वंशागत पटुता के नये, अधिकाधिक जटिल क्रियाओं में नित पुनरावृŸा उपयोग के द्वारा ही मानव हाथ ने वह उच्च परिनिष्पन्न्ता प्राप्त की है, जिसकी बदौलत रेफेल की सी चित्रकारी, थोर्वाल्दसन की सी मूर्तिकारी और पागानीनी का सा संगीत आविर्भूत हो सके। (ज़ोर हमारा)
                                                                                                     फ्रेडरिक एंगेल्स
                                                                                        “प्रकृति की द्वंद्वात्मकता“